रामनाथ शिवेंद्र
रामनाथ शिवेन्द्र व्यक्तित्व व कृत्रित्व
1.1 जन्म.... 7 मई 1946, ग्राम- खड़ुई, पोस्ट- पन्नूगंज जिला- सोनभद्र, उ.प्र.
1.2 बाल्यकाल, गॉव में
1.3 पारिवारिक जीवन... खेती-किसानी से जुड़ा हुआ
मॉ-स्व. झुनुक राज कुअरि पिता-स्व. प्रभुनारयण सिंह, भाई- स्व. बैजनाथ सिंह बड़े भाई, बीच में मैं
छोटे भाई डा. भुवनेष्वर प्रसाद सिंह, पत्नी-श्रीमती शकुन्तला देवी, पुत्रियां-मंजू देवी व गीता देवी
(विवाहित) पुत्र-स्व.अंशु शिवेन्द्र निधन (2014) बहू-लीना सिंह, पोता...नितिन सिंह( 15 वर्श दसवीं का
छात्र) पोती. Sonal सिंह (18, बी.एससी द्वितीय वर्ष)
1.4 शैक्षणिक जीवन-
1.4.1- प्रारंभिक शिक्षा--
प्राइमरी शिक्षा- प्राइमरी स्कूल- सोनवट गॉव में
1.4.2-
हाई स्कूल- राजा शारदा महेष इन्टर कालेज- राबटर््सगंज, सोनभद्र, उ.प्र.
1.4.3- उच्च शिक्षा-
बी.एच.यू. से बी.ए. तथा एल एल.बी, एडवोकेट
काशी विद्यापीठ से एम.ए.एस(एप्लायड सोसियोलाजी )
1.5 कार्यानुभव- खेती- किसानी तथा आठ साल तक वकालत अब केवल
लेखन खासतोर से कहानी, निबंध एवं उपन्यास लगभग 17 पुस्तकंे प्रकाषित
1.6 पुरस्कार....
आम जनता तथा आम साहित्यिक संस्थाओं द्वारा
(2)कृत्रित्व
2.1.1 रचना संसार-
कृतियों का विवरण संलग्नक ... देखें
-1-
सीमांत की संघर्ष गाथा ‘हरियल की लकड़ी’
अरविन्द चतुर्वेद
हंस...
समीक्ष्य कृति... हरियल की लकड़ी’ (उपन्यास)
प्रकाशक.. राजकमल,
नेता जी सुभाष मार्ग
नई दिल्ली,110002
मूल्य..195..00
सन्... 2006
ok -2-
मौलिक अधिकारों के संषर्ष की तैयारी ‘तीसरा रास्ता’
समीक्ष्य कृति... तीसरा रास्ता
पिलग्रिम्स प्रकाशन
बी.27/98-ए-8, दुर्गाकुण्ड
वाराणसी, 221010
मूल्य...225.00 फोन...(91-542)2314060
Ni-3-
कितनी लड़ाई ,कितनी बार "दूसरी आजादी"
सुरेश पंडित
समीक्ष्य कृति- दूसरी आज़ादी
पिलग्रिम्स प्रकाशन
बी.27/98-ए-8, दुर्गाकुण्ड
वाराणसी, 221010
रचनाकार.. रामनाथ शिवेन्द्र
पाठ...जुलाई...2017
ज्योतिपर्व मीडिया एण्ड पब्लिकेशन
99,ज्ञानखण्ड-3, इन्दिरा पुरम्
गजियाबाद-201012 मूल्य..299.0
रचनाकार- रामनाथ शिवेन्द्र
प्रकाशक- नेहा प्रकाशन, (शिल्पायन)
उलधनपुर, नवीन शाहदरा दिल्ली, 110032
दूरभाष-9899486788
मूल्य..450.00
प्रकाशित......कथाक्रम जनवरी-मार्च 2017 पृ...99-101
-6-
अनसुलझे सवालों की पड़ताल करता
उपन्यास ‘कनफेशन’
अमरनाथ ‘अजेय’
उपन्यास- ‘कनफेशन’ लेखक-रामनाथ ‘शिवेन्द्र
प्रकाशक----
मनीष पब्लिकेशन
471/10, ए ब्लाक, पार्ट-प्प्
सेनिया विहार, दिल्ली
मूूल्य- रु 650
-7-
पट्टा चरित
रामनाथ शिवेंद्र के उपन्यास ‘‘पट्टा चरित‘‘ की समीक्षा
‘भूमि प्रबंधन पर जायज सवाल उठाता ‘पट्टा चरित’
रामनाथ शिवेन्द्र
प्रकाशक-मनीष पब्लिकेशन,
441/10,ए ब्लाक, पार्ट-2
सोनिया बिहार, दिल्ली-110090
मोबाइल-9968762953 मूूल्य- रु 650.00
-8-
धरती कथा उपन्यास
जरूरी सवाल तो पूछे ही जाएंगे
वीरेन्द्र सारंग
प्रकाशक-मनीश पब्लिकेशन,
441/10,ए ब्लाक, पार्ट-2
सोनिया बिहार, दिल्ली-110090
मोबाइल-99687629
‘आखिर कब तक बन्द रहेंगे हम
आधुनिकता तथा उत्तर-आधुनिकता के
बाजार के कार्टूनों में?’
बहुत कम समय में जमीन की बंदोबस्ती कर भी दी जाती है। कथा का असली मकसद यहां से शुरू होता है इस बंदोबस्ती मे मारे गए आदिवासियों को वह जमीन नहीं मिलती जिसके लिए बलवा हुआ था बल्कि वह जमीन दे दी जाती है जिस जमीन से उनका कभी भी कोई नाता नहीं था जो अच्छी जमीन थी जोत कोड वाली थी जिस पर वे खेती करते थे। जाहिर है प्रताड़ित इस नई बंदोबस्ती को क्यों मानते वे आंदोलन रत हो जाते हैं और कचहरी पर धरना प्रदर्शन करते और उन्हें वही मारा पीटा जाता है तथा गिरफ्तार कर लिया जाता है। इसी दौरान कोरोना की घोषणा ह़ो जाती है और लॉकडाउन हो जाता है आंदोलन करने वाले आदिवासियों को गिरफ्तार कर लिए जाने के तत्काल बाघ कुछ ही घंटे बाद ही शासन के आदेश पर उन्हें मुक्त भी कर दिया जाता है। खेल यहां से शुरू होता है और कोरोना के बहाने पूरे गांव को सील कर दिया जाता है आदिवासियों की मांग थी कि हमें वही जमीन बंदोबस्त की जाए जिस जमीन पर हमारा पुश्तैनी कब्जा दखल चलता आ रहा है। किसे नहीं मालूम कि प्रशासन प्रशासन होता है किसी ने किसी बहाने शासन को भी ठेंगा दिखा देता है। वही हुआ हल्दीघाटी गांव में भी, बंदोबस्ती में लेन देन का खेल चला और उर्वरक जमीन उन्हें दे दी गई जिन्होंने प्रशासन की सेवा की। धरती कथा उपन्यास की कथा ही कथा का नायक है और घटना भी। औपन्यासिक रचाव के लिए कुछ पात्रों का होना जरूरी है वे पात्र भी सरवन बबुआ खेलावन सुमेरन के नाम से है तथा सुगनी बिफनी जैसी नारी पात्र भी है। वेअनुरोध करती हैं तो प्रतिरोध भी। उपन्यास खत्म हो जाता है उस बिंदु पर जब आदिवासी नई बंदोबस्ती का विरोध करते हैं और प्रतिरोध में खड़े हो जाते हैं उपन्यास में हल नहीं निकलता की आदिवासियों को अपने प्रतिरोध में क्या मिला इसे पाठकों के हवाले छोड़ दिया गया है तथा बताने का प्रयास किया गया है यह जो भूमि प्रबंधन है कितना प्रपंच भरा है। धरती प्रबंधन का जो खेल है वह पूरे सोनभद्र को परेशान किए हुए आज कचहरी में लगभग 70 प्रतिशत मुकदमे भूमि विवाद के हैं इनका त्वरित ढंग से निस्तारण नहीं हो पा रहा है केवल तारीखें पडती रहती है मुकदमे में। जमीन का मामला भी मुकदमे में जाकर अटका हुआ है भले ही नई बंदोबस्ती कर दी गई है फिर भी कथा का दर्द यही है इसीलिए यह कथा भी । सबसे मजेदार बात यह है कि यह सब तमाशा धरती भाई देख रही है और सुन रही है और पृथ्वी से स्वर्ग लोक जाने की तैयारी में है। अब नहीं रहना पृथ्वी पर पृथ्वी पुत्रों के साथ।
पहला अंश----
‘पैर तो जमीन पर ही चलेंगे!
चलिए, चलते हैं कुछ दूर धरती कथा के साथ...’
‘गॉव के दस लोगों के मारे जाने के बाद गॉव खामोश हो गया है, कोई नहीं रह गया है गॉव में, सभी लाशों के पास मुह बाये खड़े हैं। क्या छोटे क्या बड़े क्या औरत क्या मर्द, सभी खामोश और चकित हैं। खामोश तो धरती-माई भी हैं आखिर क्या हो गया गॉव में? क्या ऐसा ही समय देखने के लिए वे उतरीं थी धरती पर, यह समय का हेर-फेर है, कोई क्रीड़ा-कौतुक है, क्या है यह आखिर? धरती-माई अपना माथा पकड़ कर चिन्तन की दुनिया में चली जाती हैं...चिन्तन की दुनिया में तो अन्धेरा है, सन्नाटा है, चित्त कहीं और धक्के खा रहा है तो चेतना किसी गटर में बज-बजा रही है। वे भावुकता के परतीय क्षेत्रा की तरफ लौटती हैं फिर तो उनकी ऑखें भर भर जाती हैं...उन्हें कुछ साफ साफ नहीं दिख रहा, वे ऑचल से ऑखें पोंछती हैं फिर भी...ऑखों से लोर बह जाने के बाद अचानक उनकी ऑखों में हिलोरें उठ जाती हैं हर तरफ खून ही खून, वे कॉप जाती हैं... वे तो धरती पर अवतरित हुईं थीं धरती को हरा-भरा बनाने के लिए, पेड़-पौधे उगवाने के लिए, अन्न उपजवाने के लिए, भूख और भोजन की दूरी पाटने कि लिए पर यहां तो खून हो रहा है, कतल हो रहा है, सभ्यता का यह कैसा खेल है? धरती-माई गुम-सुम हो गयी हैं, आइए चलते हैं...धरती-कथा के साथ....’
इस धरती कथा के दो पुराने पात्र हैं, दोनों बूढ़े हैं सोमारू व बुझावन, वे पड़े हुए हैं अपनी खटिया पर। वे कराह रहे हैं, रो रहे हैं, चाह कर भी नहीं जा सकते घटना स्थल पर सो खुद पर रोते हुए अपने बाल-बुतरूओं को कोस रहे हैं सोमारू..
‘हम तऽ पहिलहीं से बोल रहे थे, छोड़ दो गॉव चलो कहीं दूसरी जगह चलें वहीं बस जायेंगे इहां का धरा है। मर मुकदमा जीन लड़ो पर नाहीं मुकदमा लड़ेंगे...’
बुझावन भी गुस्से में हैं...
‘हम जानते थे कि कउनो दिन कतल होगा हमरे गॉयें में। जमीन ओकर होती है जेकरे हाथ में लाठी होती है, ओकर नाहीं जो खाये बिना मर रहा है, जेकरे घरे में चूल्हा जलना मुहाल है।’
‘अब भोगो, दस लाल लील गई यह धरती। अउर जोतो जमीन, खेती करो, जेकरे पास जॉगर है वोके का कमी है, जहां पसीना बहाओ वहीं कुछ न कुछ मिलेगा। जाने कहां सब मरि गये कउनो देखाई नाहीं दे रहे हैं, अरे! हमहूॅ के ले चलो लालों के पास। उहां ले चलो जहां धरती माई ने खून पिया है हमरे लालों का, केतनी पियासी है यह धरती?’
पर वहां है कौन जो उन्हें लाशों की तरफ ले जायेगा। सभी तो लाशों के पास
हैं। जहां लाशें गिरी हैं। वह खेत दो किलोमीटर दूर है गॉव से, कई ढूह पार करो, ऊबड़, खाबड़ जमीन नापो तब पहुंचो वहां। वे तो खुद वहां जाने में समर्थ हैं नहीं, सो पड़े हुए हैं खटिया पर कराहते और सिसकते हुए नाहीं तऽ ओहीं जातेे।
खटिया पर बैठे हुए वे चिल्ला रहे हैं...
‘अरे हमहूं के ले चलो लालों के पास ओनकर मुहवा तऽ देख लें’ पर कोई नहीं सुन रहा उनकी, वहां है ही कौन?
सोमारू और बुझावन दोनों अपनी उमर जी चुके हैं। पिछले साल ही सोमारू को लकवा मार गया है और बुझावन को टी.बी. ने जकड़ लिया है। खॉसते रहते हैं हरदम, खॉसते खांसते बलगम निकल जाता है, पूरी बोरसी भर जाती है दिन-रात में। ऊ तो उनकी छोटकी पतोहिया है कि रोज बोरसी साफ कर दिया करती है और गोइठे की राख भर दिया करती है उसमें। उनका छोटका बेटवा बबुआ खूब खूब है वह बुझावन को खटिया पर छोड़ कर कमाने के लिए कहीं बाहर नहीं गया न कभी जायेगा। उनके दो लड़के तो चले गये हैं गुजरात, वहीं कहीं कारखाने में काम करते हैं। बुझावन कहते भी हैं मेरे छोटका लड़िकवा को देखो वह साक्षात सरवन कुमार है।
सोमारू और बुझावन दोनों जनों को नहीं पता है कि भयानक गोलीकाण्ड में का हुआ है, कौन कौन मरे हैं। दोनों शक कर रहे हैं अपने लड़कों के बारे में। सोमारू तो मान कर चल रहे हैं कि उनका सरवन ही मारा गया होगा, बहुत बोलाक है, दतुइन-कुल्ला कर सीधे भागा था खेत की तरफ। वे पूछते रह गये थे उससे..
‘कहां जाय रहे हो सबेरे सबेरे, पर नहीं बताया था कुछ भी और दौड़ पड़ा था खेत की तरफ।’
बुझावन अपनी कहानी लेकर बैठे हुए थे। उनका छोटका लड़का ही तो मुकदमा लड़ रहा था सरवन के साथ, वही दोनों गॉव को गोलबन्द किए हुए थे। उन्हें निशाने पर लिया होगा हत्यारों ने।’
कई बार बुझावन ने उसे रोका था ....
‘देखो मर मुकदमा के चक्कर में जीन पड़ो, गरीब आदमी मुकदमा नाहीं लड़ते, ई जो नियाव है नऽ वह गरीबों के लिए नाहीं होता है। गरीब आदमी का तो एक्कै काम है बड़े लोगों को सलाम करना अउर उनकी सेवा-टहल करना। पर नाहीं माना, बोलता है कि अब कउनो राजा कऽ राज है, अब तो ‘लोकतंतर’ है। हमहू आदमी हैं सो काहे डरंे केहू से, हम मुकदमा लड़ेंगे अउर हाई कोरट तक लड़ेंगे।’
अचानक बुझावन पूरी तरह से उतर गयेे गॉव की गाथा में। उन्हें याद आने लगे हैं उनके बपई। जो गोड़ बिरादरी के चौधरी थे, बहुत ही रोब-दाब था उनका। क्या मजाल था कि उनकी बिरादरी का कोई आदमी उनका हुकुम टाल दे। गॉव-घर में गलती-सलती करने पर जाने कितनों को पेड़ से बंधवा कर मारा करतेे थे पर थे सही आदमी। नियाव के लिए कुछ भी कर जाते थे, डरते तो किसी से नहीं थे चाहे मैदान का राजा उनके सामने आ जाये या जंगल का राजा शेर, भिड़ जाते थे दोनों से।’
गॉव के खातिर वे भिड़ गये थे बड़हर महाराज से। याद आ रहा है सारा कुछ बुझावन को। बड़हर रियासत का मनीजर गॉव में आया था घोड़े पर सवार हो कर ‘खरवन’ वसूलने। उससे भिड़ गये थे बुझावन के बपई...
‘ई का हो रहा है साहेब? का वसूल रहे हैं, हम लोग एक छटांग भी नाहीं देंगे ‘खरवन’ में, ई गॉव हमलोगों को महाराज ने माफी में दिया है फेर काहे का खरवन दें हमलोग।’
तूॅ तूॅ मैं मैं होने लगी थी। बिरादरी के सभी छोटे बड़े गोलबन्द हो गये थे, का करते मनीजर भाग चले रियासत की ओर।
बुझावन को याद है कि ‘जब जब तक बड़का महाराज थे उनके बाद छोटका महाराज राजा बनेे उनके जमाने में भी गॉव से एक छदाम भी ‘खरवन’ के नाम पर नाहीं गया था रियासत में। फेर बाद में जाने का हुआ के रियासत को ‘खरवन’ दिया जाने लगा। वही नेम चलता रहा बपई के जमाने तक। जो आज तक चल रहा है।’
‘ओ समय गॉये गॉये गॉधी बाबा का जोर था। हमरहूं गॉये में कंग्रेसी नेता-परेता आया-जाया करते थे। एक बार तो हमरे बिरादरी का भी नेता आया था हमरे गॉयें में जो म.प्र. के आदिवासी सटेट का राजा था। हमरे राजा साहेबओकरे संघे थे। वे लोग नारा लगवाया करते थे। संघे संघे हमहूं लोग नारा लगाया करते थे...’
‘सुराज आयेगा सुराज आयेगा’ ‘जनता कऽ राज होगा, अब परजा ही राजा होगी, कोई रेयाया नहीं होगा।’
‘गॉधी बाबा की जय’ अउर न जाने का का नारा लगाया करते थे हमहूं लोग,लइकई कऽ बात है खियाल नाहीं पड़ि रहा कुलि नरवा।
एक दिन बड़हर राजा का करिन्दा हमरे गॉये आया उसके साथ कई आदमी थे। सारे आदमी ‘पटेवा’ लिए हुए थे। ‘पटेवा’ पर मिठाइयों की भरी ‘दौरी’ थी, करिन्दा गॉव वालों को बुला कर मिठाइयॉ बांटने लगा।
‘काहे मिठाइयॉ बाट रहे हो करिन्दा साहेब...’पूछा था बपई ने
‘नाहीं जानते का...?’
‘आजु हमार देश आजाद हो गया है, अंग्रेजवा भाग गये हैं, अब हमरे देश के लोगन की हुकूमत होयगी, आपन राज होगा, हमरे पर कोई जोर-जबर नाहीं करेगा।’
‘पहिले का था हो करिन्दा साहेब...?’ पूछा था गॉव वालों ने कारिन्दा से
‘पहिले गुलाम था नऽ हमार देश, हमलोगन पर हकूमत अंग्रेजों की थी’
‘कइसन गुलाम हो करिन्दा साहेब...?’
‘हमलोग तऽ कुछु नाहीं जानते, केके बोलते हैं गुलामी अउर के के बोलते हैं अजादी।’
करिन्दा साहब से पूछ बैठे नन्हकू काका, वे हमरे बपई के छोटका भाई थे। थे तो बहुत बातूनी अउर सवाल खूब पूछा करते थे। बाद में पता चला कि ननकू काका जानते ही नहीं थे कि गुलामी का होती है। ऊ जमनवो तऽ उहय था कोई पढ़ा लिखा था नाही गॉयें में, अब ससुर के जाने का होती है गुलामी अउर का होती है आजादी। ओ समय हम लोगन कऽ जिनगी राजा साहेब से शुरू होती थी अउर राजा साहेब पर जा कर खतम जाती थी। राजा साहब का हुकूम हमलोगन के सर-माथे पर हुआ करता था।
‘ओ दिना हमलोग जाने के हमार देश आजाद हो गया है। पहिले तऽ हमलोग जानते थे कि बड़हर राजा ही हमरे राजा हैं, हमलोगन के का मालूम के हमरे राजा भी अंग्रजों के गुलाम ही थे। अंग्रेज ही देश के राज-महाराजा थे।’
‘साल दुई साल गुजरा होगा कि गॉये गॉये हल्ला मच गया। ई जो खेत कियारी है नऽ, खेती बारी कऽ जमीन है नऽ, ऊ सब ओकर है जे एके जोतत होय... जेकर जमीन पर कब्जा होय, जोतै वाले के नामे से जमीन होय जायेगी, तब हमैं खियाल आया पहिले का एक नारा..
‘जे जमीन के जोतेय कोड़य ऊ जमीन कऽ मालिक होवै’
कंग्रेसी सरकार ने ई ऐलान कर दिया है, अब न कोई राजा रहेगा न परजा, सब बराबर होय गये हैं, सब कर जगह-जमीन पर बराबर कऽ हक है।’
‘ओ समय लोग कहते थे कि सब की रियासत टूट गई जमीनदारी टूट गई। अब जे खेत का जोतदार है उहै ओकर मालिक है, अब ‘लगान’, ‘खरवन’, ‘चौथा’ राजा को नाहींें देना पड़ेगा, कानून बनि गया है।’ हमरे बाप-दादा खबर सुन कर मस्त होय गये थे कि अब राजा के मनीजर को जो ‘खरवन’ दिया जाता है नाहीं देना पड़ेगा अउर साल में एक गाय अउर बछवा भी नाहीं देना पड़ेगा। खेती-बारी के समय माफी में दस दिन बिना मजूरी काम नाहीं करना पड़ेगा। बाद में जाने का हुआ के कागजों के हेर-फेर में एक दूसरे आदमी आ गये गॉयें में कहने लगे कि गॉव की सारी जमीन अब उनके नाम से हो गई है। कांग्रेसी सरकार ने उनकी संसथा के नाम से गॉये कऽ कुल जमीन कर दिया है, अउर संसथा को गरीबों आदिवासियों के विकास के लिए नई सरकार ने बनाया है। पूरा गॉव घबरा गया था सुन कर, आसमान से गिरे अउर खजूर पर लटकि गये। लो अब संसथा वाले आय गये! राजा साहब कउन खराब थे, ओनसे तो निभ गई थी अब एनसे कैसे निभेगी? अउर तब हम आजाद कहां हुए, हम तऽ रहि गये गुलाम के गुलाम।’
पूरा गॉव भागा भागा गया था महराज के ईहां, उहां हाजिरी लगाया...
‘ई का सुनाय रहा है महाराज! एक संसथा वाला आया था बोल रहा था कि हमहन कऽ गॉव ओकरे नामे से होय गया है अब ओके खरवन देना होगा, खेती करने के बदले। का बात है महाराज आप सही सही बतायें हुजूर।’
‘हॉ हो तूं लोग सही सुने हो, जमीनदारी टूट गई है नऽ, हमहूं अब राजा नाहीं रहि गये। हमरौ सब जमीन छिना गई है, जउने जमीनियन पर हमार जोत-कोड़ है यानि सीर है बस ओतनै हमरे नामे से रहेगी नाहीं तऽ बाकी सब सरकार ने छीन लिया है। ऊ ओकरे नामे से होय गई है जेकर जोत-कोड़ था ओ जमीनी पर।’
‘महाराज जोत-कोड़ तऽ हमलोगों का है फेर हमहन के जोत-कोड़ पर संसथा का नाम कैसे होय गया। ईहै तो समझ में नाहीं आय रहा है...’
महाराज खामोश हो गये, उनके पास कोई जबाब नहीं था। उन्हें खुद समझ में नहीं आ रहा था कि जमीनदारी तोड़ने की क्या प्रक्रिया है, वे लगातार अधिकारियों के संपर्क में थे ताकि जमीनदारी बचाई जा सके।’
महाराज ने अनुमान लगाया कि जमीनदारी टूटते समय ही संसथा वालों ने हेर-फेर करके संस्था का नाम चढ़वा लिया होगा। वैसे राजा ने भी संस्था वालों के नाम से कुछ बीघे जमीन का पट्टा संस्था वालों के पक्ष में पहले ही कर दिया था पर आदिवासियों की जमीनों को छोड़ दिया था।
महाराज तो खुद टूटे हुए थे। उनकी रियासत तोड़ दी गई थी, वे परजा बन चके थे। जमीनदारी तोड़े जाने के खिलाफ वे मुकदमा दाखिल करने के फिराक में थे। बडे़ बड़े वकीलांे से सलाह-मशविरा कर रहे थे।
नन्हकू काका थे तो बातूनी पर चालाक भी बहुत थे। थोड़ा बहुत कागजों के खेल के बारे में जानते थे। उन्हें पता था कि नई दुनिया कागजों वाली है। जमीन पर जिसका जोत-कोड़ होता है उसके नाम से ही कागज बनता है। अंग्रेज एक बिस्वा जमीन का भी कागज बनवाया करते थे। उनका गॉव राजा साहब की जमीनदारी का गॉव था सो उसका कागज राजा साहब के नाम था। राजा साहब ने आदिवासियों को जो जमीन दिया था उसका रियासती पट्टा कर दिया था। अंग्रेज बिना कागज के कुछ काम नहीें करते थे।
नन्हकू काका रियासत से अपने गॉव लौट आये और जमीन का कागज तलाशने लगे। पूरे गॉव में खबर फैल गई कि अब जमाना कागजों वाला है सो राजा साहब ने जो पट्टा दिया था उसका कागज खोजो...
पूरा गॉव कागज खोजने लगा... कागजों की खोज में गॉव पसीना बहा रहा है.गॉव था ही कितना बड़ा यही कोई चार पॉच घरों की बस्ती। फूस के मकान, फूस की दिवालें...और करइल माटी की जमीन। फूस के घेरों से बने घर, घर क्या किसी के पास एक कमरा तो किसी के पास दो कमरा। किसी के पास बांस की चारपाई तो किसी के पास वह भी नहीं। लेवनी, फटे कंबल, कथरा, एक दो चादर ओढ़ने व बिछाने के नाम पर बस इतना ही... और सामान रखने के लिए...टीन के छोटे बक्से किसी घर में वह भी नहीं, वैसे रखना भी क्या था, क्या था ही आदिवासियों के पास। जंगली गॉव था, लेन-देन की परंपरा थी, कोइरी अनाज ले कर तरकारी दे दिया करता था, बनिया अनाज लेकर कपड़ा और परचून का सामान दे दिया करता था। कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो रोजाना गॉव आते थे और दारू खरीदते थेे। दारू से कुछ कमाई हो जाया करती थी गॉव वालों की। इसी कमाई से आदिवासियों का गुजारा होता था।
पूरा गॉव दारू चुआने में माहिर था। हर घर में एक अड़ार था। बर्तन में महुआ सड़ रहा होता था, खमीर उठने पर दारू चुआना शुरू होता था।
गॉव की यह ब्यवस्था जो सरकारी तो नहीं थी पर समझदारी से पूर्ण थी वह थी आपसी सहयोग की। एक दिन में एक ही घर में दारू चुआई जाती थी दूसरे घर में नहीं। पूरे साल यही क्रम चलता था। बारी से बारी से दारू चुआना और उसे बेचना यह कुटीर उद्योग की तरह था। यह कब से था किसी को नहीं मालूम। वहां की दारू का गुण-गान गरीब गुरबा ही नहीं जमीनदार किसिम के रईस भी किया करते थे। लोग बताते हैं कि होली, दशहरा के पहले वहां की दारू खरीदने के लिए मारा-मारी तक हो जाया करती थी। इलाके के लोग खास त्याहारों के लिए वहीं से दारू खरीदा करते थे।
घरों के सारे बर्तन देख लिये गये, एक दो जो बक्से थे वे जाने कितनी बार देखे गये पर कहीं पट्टा वाला कागज नहीं मिला। कागज होता तो मिलता, कागज तो था ही नहीं फिर मिलता कैसे।
नन्हकू काका को सिर्फ इतना मालूम है कि राजा साहब का कारिन्दा पट्टा का कोई कागज बहुत पहले दे गया था। कागज देने के बदले में एक बकरा भी हॉक ले गया था और दो बोतल दारू उपरौढ़ा से लिया था। उस कागज को किसने रखा यह उन्हें याद नहीं। वह जमाना कागजों वाला था भी नहीं, जुबान वाला था, गर्दन कट जाये भले पर जुबान न कटने पाये। नन्हकू काका माथ पकड़ कर बैठ गये।
वैसे नन्हकू काका थक-हार कर बैठने वालों में नहीं थे। दारू बेचने का अगवढ़ ले कर वे एक दिन मीरजापुर पहुंच गये, मीरजापुर ही तब जिला था।
नन्हकू काका दूसरी बार मीरजापुर आये थे। एक बार तब आये थे जब उन्हें माई के दर्शन के लिए विन्ध्याचल धाम जाना था और फिर इस बार कागज तलाशने। मीरजापुर पहुंचने पर उन्हें ख्याल आया एक वकील का, जो कुछ महीने पहले ही उनके गॉव आया था और हिरन की खाल के लिए रिरिया रहा था। हिरन की खाल किसी ने उसे नहीं दिया सभी ने बोल दिया कि नहीं है खाल। ये नन्हकू काका ही थे जो उसकी रिरियाहट से पसीज गये थे और वकील को हिरन की एक खाल इन्तजाम करके दिया था। वकील बहुत परेशान था उसका लड़का बीमार था किसी तांत्रिक ने उसे बताया था कि हिरन की खाल पर बैठ कर ही तंत्रा-साधना करनी होगी।
नन्हकू काका वकील का नाम याद करने लगे..कौन था वह वकील, का नाम था उसका, बहुत ही चाव से उनकी बनाई दारू पिया था और अपनी जीप में एक मटकी रख भी लिया था...
‘ऐसी दारू मिलती कहां है?’ उसने कहा था
कोई बात नाहीं, नाम नाहीं याद रहा तो का हुआ कचहरी में तो पहचना जायेगा ही, यही होगा कि उसे खोजना होगा पूरी कचहरी मंे।
नन्हकू काका कचहरी करीब बारह बजे पहुंचे। पैदल ही मीरजापुर जाना था कलवारी से होते हुए लालगंज फिर मीरजापुर। तीन दिन से पैदल ही चल रहे थे, पैर सूज गया था पर हिम्मत थी, सो तनेन थे और कड़क भी...कचहरी पहुंच कर लगे खोजने वकील को। तब कचहरी नाम में तो बड़ी थी पर आकार मेंआज के मुकाबिले बहुत ही छोटी थी। खोजते, खोजते नन्हकू काका जा पहुंचे वकील के पास...
वकील काका को न पहचान पाया, तीन साल पहले की बात थी वह भूल चुका था काका को। काका ने उसे याद दिलाया फिर उसे याद आया हिरन की खाल से। वकील चौंक गया...
‘अरे! नन्हकू तूॅ...’
‘ईहां काहे आये हो, का बात है...का कउनो काम आ गया कचहरी का..?’
‘हॉ सरकार तब्बै तो ईहां आया हूॅ’ नन्हकू ने बताया
‘का काम है हो, बताओ तो..’
नन्हकू काका ने वकील को काम बताया। जमीन कऽ काम है सरकार! राजा साहब ने हमारे खानदान वालों को जमीन पट्टा में दिया था। ऊ जमीन पर हमलोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। ओ जमीनी केे हमरे बाप-दादों ने काट-पीट कर समतलियाया था, कियारियॉ गढ़ी थीं फिर खेती बारी शुरू हुई थी अउर आज भी हमलोग उसे जोत कोड़ रहे हैं। वह जमीन कउनो संस्था वाले के नाम से होय गई है। एही के पता लगाना है सरकार के हमलोगों के जोत-कोड़ वाली जमीनिया केकरे नामे होय गई!
‘ठीक है नन्हकू! हम आजै पता लगा लेते हैं पर ई बताओ एतना दिना कहां थे? जमीनदारी टूटे तो चार साल होय गया, ई सब काम तो वोही समय कर लेना चाहिए था।’
‘का बतावैं सरकार! हम लोग ठहरे जंगली, हम लोग का जानते हैं कानून-फानून के बारे में कि का होता है कानून। हम लोग का जानते साहेब ऊ तो संसथा के दो आदमी गॉव में आये थे। जमीन देखने लगे, खेती के बारे में पूछने लगे कौन कौन जोता कोड़ा है किसकी फसल है। हम लोगों ने सही सही बताय दिया और वे लोग उसे कागज पर उतार भी लिए। फिर बाद में पूछने लगे..राजा साहब को खरवन में केतना रुपिया देते हो तुम लोग?’
हमलोगों ने बता दिया कि पहिले एक पैसा बिगहा दिया जाता था अउर अब तीन आना बिगहा दिया जाता है।
‘तो अब वह खरवन तूॅ लोग हमारी संस्था को देना, इस गॉव की सारी जमीन हमलोगों की संस्था के नाम से होय गई है।’
‘ओही दिना हम लोग जाने सरकार कि जमीन का कागज बनता है। तब हम लोग पता करने लगे कि हमलोगों की जमीन का कागज बना है कि नाहीं।’
वकील चला गया कागज के बारे में पता करने किसी आफिस में, नन्हकू काका वहीं बैठे रहे। करीब एक घंटे बाद वकील वापस लौटा और नन्हकू काका को बताया। उससे काका हिल गये...
‘अब का होगा सरकार! कैसे चढ़ेगा हमलोगन कऽ नाम कागज पर। अगोरी से भाग कर तो बड़हर आये थे, राजा साहब ने बसाया था हम लोगों को, अब कहां जायेंगे इहां से उजड़ कर। पहिले तो जंगल काट कर जमीन बना लेते थे हम लोग अब तो जंगल का एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते। नन्हकू काका माथा पकड़ लिए।’
‘नन्हकू! तूॅ लोगों का नाम नाहींें लिखा है जमीन पर ओपर कउनो संस्था का नाम लिखा हुआ है, कहां की है यह संस्था, जानते हो का? एक काम करना तूॅ लोग जमीन पर से कब्जा कभी नाहीं छोड़ना, बूझ गये नऽ मेरी बात। जोत-कोड़ में संस्था वाले दखल करंेगे या मारपीट करेंगे तो तो सीधे चले आना मेरे पास। हम देख लेंगे संस्था वालों को। हम अजुएै एक दरखास लगाय देते हैं देखो का होता है ओमें...’
नन्हकू काका को को कुछ पता नहीं था कि कैसे कागज बन गया संसथा वालों का। जोत-कोड़ के हिसाब से कागज बनना था तो संसथा वालों का कैसे बन गया। वकील ने साफ बताया काका को कि घपला किया गया है कागज बनाने में।
मीरजापुर में ननकू काका ने एक मुकदमा दाखिल करा दिया...
‘साहब आप देखो हमलोगांे का मुकदमा, आपका खर्चा-पानी देने में कमी नाहीं करेंगे हमलोग।’ वकील से बोल-बतिया तथा मुकदमा दाखिल करा कर नन्हकूं काका वहां से गॉव लौटआये।
गॉव में सन्नाटा पसरा हुआ था जाने का हो मीरजापुर में। काका की बातें सुनकर गॉव सन्न हो गया...गॉव वालों ने पूछा काका से...
‘अब का होगा काका?’
‘का बतावैं हो, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, एक बात है वकील ने कहा है कि जमीन पर से कब्जा न छोड़ना, तो समुझि लो के हमलोग कउनो तरह से कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’
यह आजाद भारत का नया कानून था कागजों पर लिखा हुआ जो नन्हकू काका को कुदरती जमीन से बेदखल करने वाला था। ऐसी जमीन से जिसे किसे ने नहीं बनाया, जिसे किसी ने नहीं रचा, उसे खेती करने लायक बनाया नन्हकू काका के पसीने ने, पसीने ने ही उसे समतल किया, कियारियां गढ़ीं। देश आजाद होते ही किसिम किसिम के मालिक उग गये धरती पर, किसिम किसिम की धरती-कथा लिखने लगे। पहिले के जमाने में धरती-कथा लिखने वाले जो राजा थे, मालिक थे, वे टूट रहे थे और दूसरे किसिम के लोग धरती-कथा लिख कर राजा बन रहे थे।
109-पटपड़गंज गॉव, दिल्ली-110091
मो...8800139684, 9312869947
प्रथम संस्करण 2022
मूल्य..400.00
जंगल दंश का पहला अश----
‘लाईन में लगना और लाइन बन जाना,
अलग अलग बातें हैं, यानि कथा आगे है’
कुछ अपने बारे में
आदमी तभी बचेगा जब कहॉनियॉ बचेंगी
किरण अग्रवाल
1/212, फूलबाग, जी. बी. पंत विश्वविद्यालय
प्रकाशक: असुविधा
अक्षर घर, रावर्ट्सगंज, सोनभद्र 231216 उ. प्र.
संस्करण: प्रथम 2017, मूल्य: 100 रूपये.
आदमी को बचाना ही ‘कथा का समाज शास्त्र’ है
अमरनाथ अजेय
वार्ड नं. 09, नई बस्ती
प्रकाशक: असुविधा
अक्षर घर, रावर्ट्सगंज, सोनभद्र 231216 उ. प्र.
संस्करण: प्रथम 2017, मूल्य: 100 रूपये.
उपन्यासों के कुछ महत्वपूर्ण उद्धरण.....
हरियल की लकड़ी......
1-‘सदी का गुज़रना इस गॉव से गायब था। यहां परंपरायें थीं, उनका दबाव था। दूसरी कोई चीज थी तो वह था जंगल, नदी नाले पहाड़। जंगल में महुआ, करवन, बेर, हर्रा, बहेरा जैसे कुछ जंगली फल-फूल थे। जिन्हें अपने उपयोग के लिए प्रयोग में लाना कानून प्रतिबंधित और दण्डित करता था। गॉव हजारों साल की परंपराओं में कुछ इस तरह ढंका था कि नई सदी का कहीं अता-पता न चलता था। एक तरफ धॉगरी बोलते हुए करम देवता खड़े थे तो दूसरी ओर मैदानी इलाके में राम, कृष्ण, शंकर जैसे देवता भी पुजहाई करवाने में कम न थे। हाल के सालों में कुछ नेताओं, परेताओं के नाम भी गॉव में घुस चुके हैं। (पृ.68)
2-‘चेरवान के परिवारों की संख्या चालीस थी तथा धॉगर कुल पैंतालिस परिवार थे, अहीर जो लगभग भूमिहीन थे उनकी संख्या चार परिवार की थी। भूमिहीन व गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारने वाले इन परिवारों के बच्चे स्कूल न जाते थे।.... बहुतायत लोगों के पास बंधी में ली गई जमीनों के एवज में चौदह-चौदह बिस्वों के दिए गये छोटे-छोटे जमीन के टुकड़े थे। गॉव के भूमिहीन जंगल विभाग के कामों पर सब्बल, गैंता, फावड़ा चलाते और औरतें टाकरियॉ ढोतीं। कभी जंगल में वृक्षारोपण का काम भी मिल जाता।’लेकिन जिस बसमतिया की जिन्दगी दागों वाली दुनिया की न थी, वह जल की तरह चमकदार थी और पारदर्शी भी। पृ..54
3-‘बसमतिया वर्तमान में जीने वाली औरत थी। उसके पास न तो अतीत की आनददायक स्मृतियॉ थीं और न ही भविष्य का मनोरम सपना था’ पृ..127
4-‘भउजी जबसे तुम्हारा ननदोई भागा है तबसे जाने क्या हुआ कि मेरी देह भी उसके साथ चली गई है। समझ में नहीं आता कि देह कैसे चली गई, मेरी खुशियां लेकर.... मुई देह भी गुसिया गई है मुझ पर... पृ..52
5-‘फैसला कब तक हो जाएगा वकील साहब! यहां आओ तो सŸार अस्सी रुपया खरच हो जाता है, दो दिन का नुकसान अलग से। रोज कमाओ खाओ नहीं तो फांका...पृ..159।
6-‘गॉव के आकाश का सूरज, गॉव के हिस्से की जमीन, धूप हवा, जंगल, पहाड़ सभी कुछ गॉव में होते हुए भी गॉव से बाहर थे उन पर दूसरों का कब्जा था। नदी का पानी दूर जाकर नहर में गिरता था जिससे गॉव का रिश्ता नहीं। गॉव का पहाड़ टूट-टूट कर ढोंका, पटिया, चूना, सीमेन्ट, अल्युमिनियम बनता था, जंगल कटकर पलंग, कुर्सी,मेज, किवाड़ वगैरह में ढलता था पर बसमतिया का मायका.... बिना नहर वाला, बिना कुर्सी वाला, बिना सीमेन्ट वाला था जो आज भी है। इतिहास की बनती बिगड़ती स्थितियों ने कभी भी इस गॉव का भला नहीं किया’ पृ...73-74।
‘तीसरा रास्ता’
‘क्रान्ति एक छलावा है, तथा विकास यथार्थ’
‘बुद्धि के व्यापार के लिए किसी एन.जी.ओ. का होना आवश्यक था सो उसने अमेरिकी फन्डर की बात जस के तस मान कर अपनी संस्था बना ली’ पृ..21
(देह में तब्दील हो जाना एक स्वरूप तथा विरोधी स्वरूप अपनी अस्मिता के बचाव में प्रतिरोध करना) पर
‘आर्थिक उदारवाद तथा एन.जी.ओ. संस्कृति ने आन्दोलनों के चरित्र की हत्या कर दी है’ पृ..224
‘एन.जी.ओ.वाले.बेकारी तथा बेरोजगारी का लाभ उठाते हैं तथा रुपया कमाने का व्यापार करते हैं....आधे से भी कम मजूरी पर कार्यकर्ताओं का शोषण करते हैं पृ..198
‘ये एन.जी.ओ. वाले गरीबी, भुखमरी,बीमारी का सौदा करते हैं तथा अमेरिका व इंग्लैंड को बेचते हैं। पृ..198
‘करमा’ गा गा कर नाचने लगता है। पृ..222।
‘हम साकारी विधानों, कानूनों, परंपराओं के तार्किक व प्रतिबद्ध अहिंसक अवज्ञाकारी हैं, इस अवज्ञा के दौरान हमें हक़ है कि हम अपनी हिफाजत करें तथा जनता की भी जिसे जागरूक बनाने के लिए हम संकल्पित और लक्ष्यित हैं’ पृ..33
‘अमेरिकियों का नारा था जिसका पेट भरेगा वह खूनी क्रान्ति नहीं करेगा सो रुपया बांटो, खाना दो, पढ़़ाओ, दवाई दो यानि उन्हें बचाओ जो खुद मर रहे हैं या प्रायोजित मृत्यु के लिए क्रान्तिकारी बन रहे हैं’ पृ..35
‘डी.बी. को स्वयंसेवी संस्थावाद की इस परिभाषा से पहले कुछ दिक्कत हुई, क्यांकि तब तक वह मानसिक रूप से दिवालिया नहीं हुआ था, उसे कदम कदम पर मार्क्स याद आते जैसे रति प्रसंग के दौरान फ्रायड’ पृ..39
‘तुम्हारा नाम प्रवीण है, तूं एन.जी.ओ. चलाता है, तूं गॉव का विकास करेगा खैरात बांट कर। तूं जमीन क्यों नहीं बटवाता? ’पृ..64
‘वैसे भी वे इतिहास की अश्लील आदतों से परिचित न थे कि वह परिवर्तित होने वाली परिघटना है तथा समय समय पर कई तरह का रंग रूप धारण करना उसका स्वभाव है। पृृ..106
‘सरकार के पास इतनी बड़ी जेल नही जो सभी को जेल में रख सके’ पृ..116
‘बड़े उद्योगों का विशाल सांचा नहीं बचेगा... यदि लाभ, अतिरिक्त लाभ वाली व्यवस्था को सहभागितापूर्ण अर्थतंत्र व प्रबंधन से तोड़ दिया जाए, इससे नौकरशाही का सांचा भी तोड़ा जाना संभव हो सकता है।’
‘प्रतिरोध कार्यक्रम खुला-खुला था यानि कि नई दुनिया संभव है पर दान, प्रतिदान, बैंक कर्जों के आवंटन, दया व कृत्रिम आर्थिक सहयोग के द्वारा नहीं...। संभव बनाया जा सकता है बराबरी का दर्जा देकर, क्रय शक्ति बढ़ा कर, अवसरों में समानता का वातावरण बना कर, सामाजिक मर्यादा बहाल कर? उत्पादनों को जनोन्मुखी बना कर’ पृ...193
‘आखिर हम आदिवासी ही क्यों उजाड़े जाते हैं, जमीन में कोयला, हीरा, सोना, चॉदी चाहे जो मिल जाये उजड़ो, हमेशा उजड़ते रहो, हमारा कुछ भी नहीं, ऐसा नहीं चलेगा। हम कोई लाश नहीं, हमारा भी हक़ है इस माटी पर, इस जंगल पर, अब हम इसे कटने नहीं देंगे, जंगल का फल-फूल, बालू, मिट्टी सारा हमारा, हमें नहीं चाहिए दिल्ली’ पृ.....224
‘यहां आकर इतिहास मरे न मरे पर विज्ञान, राजनीति, दर्शन और धर्म सारे के सारे यहां आकर मर चुके हैं इसलिए इस परिक्षेत्र में बारहवीं शताब्दी आज भी जीवित है। इनके चेहरे आज पूंजीवादी बर्बरता के परिणाम हैं’ पृ...227
‘ढूह वाली लछमिनिया’
‘गलतियां हो जाती हैं किसी की जान लेना ठीक नहीं।’
‘का फरक है जेहल अउर ईहां में? ईहां से तो जेलवय ठीक है, न मार का डर, न चोरी चमारी का डर, खाओ अउर सूतो’
‘चरिŸार लड़कियों को जानता है, यदि मजबूरी न हो तो वे किसी को भी सभ्य बनाकर ऐसा संस्कारित कर दें कि वे जीवन भर नाम न लें कि लड़कियां ऐसी होती हैं जिनकी देह पर बाजार का अर्थ लिखा जा सकता है’
‘पर शंकर यादव अपने घर लौटने के बाद अपने में डूब गया.. ज़माना बदल गया है, जंगल जाग रहा है पहले वाला नहीं कि सोया हुआ था। सरकारें भी अब पहले वाली नहीं हैं, गरीब गुरबों की सरकार प्रदेश में काबिज है, गरीबों की सुरक्षा के बाबत कानून बन गये हैं। थाना हो या कचहरी अब कहीं भी गॉधी टोपी वाले नहीं दिखते, ठाकुर, बाभन जैसे ज़मीनदार अपनी गुफाओं में बैठे हैं, करंे भी तो क्या?’ पृ...20
‘चुप रह छोटकू, तूं बड़बड़ करता रहता है, तूं का जानेगा कायदा, कानून, अब तो पुलिस पेड़ों अउर झाड़ियों पर भी मुकदमा कर देती है’ पृ..21
‘समझेगा का? यही कि चिड़िया जाल में, जाल खींचो अउर पकड़ लो’ पृ..38
‘का खाली, का भरा, खाली ही ठीक है, पहिले मॉग भरो फिर पेट, आया था एक लंगूर’ पृ...47
‘देख महटर, हम तोहरे पर इलजाम नाहीं लगा रहे, खाली हम अपने को बचाय रहे हैं,नाहीं बचायेंगे तो...मन तो भर जायेगा जो खाली खाली है, पर मनवै तो नाहीं भरेगा नऽ, पेटवो तऽ भर जायेगा’ पृ...51
‘लछमिनिया ऐसी नदी नहीं जिसे बांधा जा सके या पुल ही बनाया जा सके’ पृ...57
‘गॉव में जबसे चिमनियां घुसी हैं, न जाने कितने किसिम के धुंआ भी घुसे हैं’ पृ..61
‘नींद में केवल नींद ही नहीं थी, उसमें पीड़ित लड़की थी, उसकी बेबस छटपटाहट थी,खूनी पंजे थे। लड़की छटपटा तथा चीख रही थी, चीखें निकलतीं जो कमरे की दीवारों, छाजन से टकराकर बिस्तरे पर भहरा जातीं, फिर पसीना पसीना हो जातीं। खूनी पंजे किसी उत्सव में डूबे हुए देह का मनोरम चूमते चाटते। पृ...76
‘संघरस तो मरदों का काम है, एमें जनाना का करेंगी? पृ...81
‘वैसे गॉवों में कागजों की पहुंच बहुत कम होती है, और कानून तो कागजों पर ही उछलता कूदता है।’ पृ...87
‘टोले मं जनतंत्र की आग धधक रही थी’ पृ..90
‘उस दौर के अधिकारी भी खूब थे, कानून की सजी संवरी जीभ वाले, पुलिस के पास तो बारूदी जुबान थी ही।’ पृ..92
‘बाल, बुतरू भी नौकरों से जनमवाते हैं का अइया?’ पृ..93
‘इस सभ्यता ने तो यही सिखाया है कि हर चीज बेचे जाने योग्य है।’ पृ..101
‘अरे! मरदवा तऽ सभै हरामी होते हैं।’ पृ...127
‘लछमिनिया तूं घूंघट काढ़कर घर में बैठी है, निकल बाहर, हल्ला कर, चिल्ला जोर जोर से, कोई तो सुनेगा, कोई तो चलेगा तेरे साथ’ पृ...136
‘भगाई को राजीनामा बोलता है, एके कानून बचायेगा, जा कानून के संगे खा, पी, अउर हग, मूत। रहेगा कहां रे! पृ...139
‘अन्तर्गाथा’
1-‘‘प्रवासीनाथ थे कि बिना सुरा सुन्दरी के न कुछ लिख पाते थे न किसी का कोई काम करा पाते थे। वे इसे लिखने का रोग मानते थे। सुरा, सुन्दरी से बचने के लिए जिन लोगों ने कुछ न लिखने की कसम खा रखी है, उन्हें वे बहुत अच्छा मानते तथा खुद को बुरा।’’ ‘‘कल्पनाओं के सहारे शब्दों एवं संवेदनाओं से निरंतर सहवास करते रहने से लेखक का मनोरोगी हो जाना स्वाभाविक है’’
2-‘‘कहां जाऊं गुरू? यहीं पैदा हुआ, यही पला, बढ़ा और पढ़ा लिखा। मेरी सभा का विरोध न करो, सभी को सुनना सीखो, रही लड़ने की बात तो एक एक करके आओ, फरिया लो।’’
3-‘‘थाने गये थे का गुरू? का हुआ?/ होगा क्या, सौ रुपये में सौदा पटा/महिनवारी/ हॉ/बंबई जा रहे हो न?/नहीं, जाने का मन था पर अब नहीं जाऊंगा/ काहे?’’
4-..‘‘यार! यह धन पशु जद्दो भाई तो अन्तःमन से कामरेड है’/ ‘का गुरू कब से जेबा में गुड़ लेके चलय लगला?’ जेल और कचहरी तो मर्दों के लिए ही होती है’/‘हड़ताल, घेराव, प्रदर्शन तो पूंजीवाद के गुप्तांग हैं’’
5-‘गरीब हंू, मार लीजिए, कोई दूसरा होता तो मारते क्या? यात्री ने उसे दुबारा झापड़ मारा, उसने भी सांस्कृतिक बयान दिया...साले! पन्द्रह साल से कुबेर (धन के देवता) को खोज रहा हूं, मिल जाता नऽ , रामकसम पटक पटक कर उसे मारता.. पर मिलता ही नहीं, मिलते तो गरीब हैं फिर किसे मारूं?
6-‘रहस्यमय ढंग से ठकुराइन टोंकती...अपने हिस्से का...
7-कहां से कैसे आपका हिस्सा? आप कहते हैं हमारे देश में गरीबी है... लोग खाये बिना मर रहे हैं... उस पर आप का हिस्सा, यह हिस्सा क्या है?
8- ‘‘यार ठकुराइन! तुम तो मार्क्स की बिटिया जैसी जान पड़ती हो, देखो, इस रूप को बनाये रखो, कहीं लेनिन या माओ का बेटा बन गई तो...यह तुम्हारा जद्दो आग में जल जायेगा।’’
दूसरी आजादी....
1-नोआखली में गॉधी जी के साथ चलने वालों में थोड़े से लोग थे जिनके चेहरों पर कॉग्रेस पारटी का लक्ष्य और स्थिति दोनों दीखती थी, सबसे मजेदार यह ािा कि सभी लोग राजनीतिक ताप से तने हुए सुखों से स्वअर्जित निर्वासन में थे। पृ..28
2- ‘गॉधी जी योद्धा हैं, भय जीतने वाले’ पृ..28
3-या तो मेरी हत्या करो या यह दंगा बन्द करो। गॉधी जी का नोआ खली में होना ही प्रमाणित करता था कि देश का बटवारा अपरिहार्य नहीं था’ पृ..28
3-अॅग्रेज हाकिम का परिवार आस्थावादी परिवार था तथा एक ऐसे ईश्वर की कल्पना किया करता था, जो सभी के दुखों, पापों का निवारण करने में समर्थ था’ पृ..37
4-तुम अपना अधिकार छोड़कर बहुत बड़ी गलती कर रहे हो तथा एक आदमी को और अन्याय करते रहने देने के लिए मौका दे रहे हो’ क्या तुमने सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा से यही सीखा है कि खुद को उचित हस्तक्षेपों से निरस्त कर दो’ पृ...41
5-हद हो गई ये लोग जो आश्रम की अथाह पूॅजी में गोते लगा रहे हैं इस्टेट सभी जानते है और उनके बारे में पूछते हैं पर कोई प्रेमचन्द्र, प्रसाद, कबीर के बारे में नहीं पूछता, भारतेन्दु का तो यहां नाम लेवा भी नहीं’ पृ..47
6-‘अब तो हम स्वतंत्र हैं? शायद यह स्वतंत्रता हमें इस लायक बना दे कि हमें आदमी होने पर शर्म न महसूस हो’ ‘ पृ..65
7-‘लेकिन खतरे भी कम नहीं क्योंकि स्वतंत्र रहना हमारी आदत नहीं, हमें हमेशा एक चतुर चरवाहे की आवश्यकता रहती है कि हमें वह किसी मजबूत डन्डे से हॉकता रहे’ पृ...65
8-‘नहीं ममा आप नहीं जानतीं कि रामदयाल जी सिर्फ ब्राह्मण ही नहीं, वे एक भले आदमी हैं तथा भेद-भाव, छुआ छूत जैसी बीमारियां उनमें नहीं हैं।पृ...75
9-वह एक जटिल निबंध था जो सामाजिक संबधों को मुद्रा के द्वारा नियंत्रित होने की व्याख्या करता था। सांस्कारिक, व्यावहारिक व मानवीय संबध नहीं, सारे संबध, आदमी औंर आदमी के बीच मौद्रिक होंगे, आदमी मूल्य होगा और वह बिकेगा, संबध, नैतिकता, ईमानदारी, सारा के सारा बिकेगा’ पृ...95
10- ‘ तो क्या जमीन आपकी है?मेरी है,किसी जमीनदार की है, किसी राजा की है? जमीन आपने पैदा किया? समतल किया, खेती किसानी लायक बनाया, कुछ किया आपने जमीन के लिए ....यदि नहीं फिर आप मालिक कैसे?कुछ भी नहीं है आपका, आपलोगों से तो जीवन जीने की स्वतंत्रता भी छीन लेनी चाहिए। लेकिन उल्टा होता रहा आज तक जिसे जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए वही गुलाम है, अछूत है, शोषित और गरीब है.....’ पृ...136
11-‘ जब तक किसान क्रान्ति नहीं होगी तब तक सामाजिक व्यवस्था में बदलाव न आ पाएगा। ऐसी क्रान्ति का आरंभ बंगाल में किया जा चुका है। देश के अधिकांश बुद्धिजीवी अपना व्यक्तित्वांतरण करके उस क्रान्ति में शामिल हो रहे हैं। आप भी चलिए एक नई दुनिया जो सार्थक प्रयासों तथा वैचारिक प्रतिवद्धताओं से संभव है, आपकी भागीदारी उसमें आवश्यक है
12- ‘नहीं मैं ऐसी किसी कार्ययोजना का सहभागी नहीं हो सकता जिसमें बन्दूकें समाज का राजनीतिक व सामाजिक इतिहास लिखती हों और समाज के लिए बारूद की गंध पीना अविार्य कर दिया जाए’ पृ...164
13-नई दुनिया संभव है यदि लोग जेल, फावड़ा और वोट की संयुक्तता तथा व्याक्ति होने के नाते अपनी संप्रभुता को समझ ले फिर तो कुछ हजार लोग जो भारत के भूगोल, संस्कृति, साहित्य और राजनीति का व्याकरण लिख रहे हैं किसी खाईं में गिरकर अपना चेहरा छिपाने की कोशिश के अलाव किसी दूसरे विकल्प की तरफ जा ही नहीं सकते’ पृ..170 ।













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